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क्या पिनराई विजयन ने पहले ही मान ली हार? सोशल मीडिया बायो बदलने से मची खलबली, हटाया मुख्यमंत्री का टैग

 Written By: Jaya Dwivedie @JDwivedie
 Published : May 04, 2026 10:04 am IST,  Updated : May 04, 2026 10:06 am IST

इधर UDF ने केरल विधानसभा चुनाव के शुरुआती रुझानों में भारी बढ़त बनाई, वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने सोशल मीडिया से CM का टैग हटा दिया है। आखिर माजरा क्या है, इसकी चर्चा सोशल मीडिया पर होने लगी है।

Pinarayi Vijayan- India TV Hindi
पिनाराई विजयन। Image Source : PTI

केरल विधानसभा चुनाव के नतीजों की आधिकारिक घोषणा से पहले ही राज्य की राजनीति में एक अप्रत्याशित घटनाक्रम ने सबका ध्यान खींच लिया है। मुख्यमंत्री पिनराई विजयन द्वारा अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर किए गए एक छोटे से बदलाव ने बड़े राजनीतिक संकेत देने शुरू कर दिए हैं। सोमवार सुबह होने वाली मतगणना से ठीक पहले विजयन ने अपने आधिकारिक प्रोफाइल से मुख्यमंत्री शब्द हटा दिया है। अब उनके परिचय में केवल माकपा (CPI-M) के पोलित ब्यूरो सदस्य होने का उल्लेख है। इस कदम ने विपक्षी खेमे और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चाओं का दौर शुरू कर दिया है कि क्या वामपंथी किले में दरार पड़ चुकी है।

विजयन के कदम के मायने

विजयन के इस फैसले को लेकर राजनीतिक हलकों में दो तरह की राय उभर रही हैं। एक वर्ग का मानना है कि हालिया एग्जिट पोल्स में कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ (UDF) की संभावित बढ़त को देखते हुए मुख्यमंत्री ने अपनी हार स्वीकार करने का संकेत दिया है। वहीं दूसरी ओर उनके समर्थकों का तर्क है कि यह केवल एक नैतिक और संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा है। उनके अनुसार वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने और नए जनादेश के आने से पहले पद का मोह छोड़ना एक स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा है। हालांकि जिस समय यह बदलाव किया गया है, उसने संशय की स्थिति पैदा कर दी है।

Pinarayi Vijayan
Image Source : PINARAYI VIJAYAN Xपिनाराई विजयन का सोशल मीडिया।

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धर्माडम सीट पर साख की लड़ाई और चुनावी समीकरण

पिनराई विजयन खुद अपनी पारंपरिक सीट धर्माडम से चुनावी मैदान में हैं, जहां इस बार मुकाबला काफी चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि 2021 में उन्होंने यहाँ से रिकॉर्ड जीत दर्ज की थी, लेकिन इस बार यूडीएफ के वीपी अब्दुल रशीद और भाजपा के के रंजीत ने मुकाबले को त्रिकोणीय बनाकर विजयन की राह मुश्किल करने की कोशिश की है। राज्य में 9 अप्रैल को हुई 78.27% की भारी वोटिंग को भी सत्ता विरोधी लहर के रूप में देखा जा रहा है।

वामपंथ के लिए अस्तित्व का संकट

2021 में इतिहास रचने वाली एलडीएफ सरकार के लिए इस बार की जंग अस्तित्व की लड़ाई बन गई है। यदि रुझान परिणामों में बदलते हैं तो केरल में दशकों पुरानी सत्ता परिवर्तन की परंपरा फिर से लौट आएगी। इसके साथ ही यह राष्ट्रीय स्तर पर वामपंथी राजनीति के लिए भी एक बड़ा झटका होगा, क्योंकि केरल वर्तमान में उनका एकमात्र गढ़ है। अब सभी की निगाहें 4 मई के अंतिम नतीजों पर टिकी हैं, जो यह तय करेंगे कि विजयन का यह सोशल मीडिया अपडेट एक औपचारिक प्रक्रिया थी या सत्ता से विदाई की शुरुआती घोषणा। इसके साथ ही पड़ोसी राज्य तमिलनाडु और पुडुचेरी के परिणाम भी दक्षिण भारत की राजनीति की नई दिशा तय करेंगे।

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